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Wednesday, March 25, 2015

Wednesday, August 28, 2013

बहन (राखी)





मेरी बहन, बडी प्यारी बहन
कोई बडी मुझसे, कोई छोटी बहन

कितने गर्व से कहती है, मुझे भाई अपना
और मुझसे ही हमेशा, उसका झगडना
कितना सुनहरा बचपन, बीत गया अपना
ना जाने कैसे सीख गई, वो घर सजाना

हर बार जमाती धौंस अपनी मुझ पर
कहती थी, चली जाऊँगी तुझे छोडकर
तू रोयेगा मगर मैं आऊँगी नहीं
ढूँढेगा मुझे पर मिलूँगी नहीं

फ़िर ना जाने क्यों वो बडी हो गई
और एक दिन मुझे छोडकर चली गई
वो रोई खूब, मैं भी रोया जमकर
और जमा गई अपनी धौंस मुझ पर

कभी सोचता था कब जायेगी यह
अब सोचता हूँ क्यों चली गई वह
सीधी-सी, सरल-सी, प्यारी-सी बहन
मेरी दीदी, मेरी जीजी, मेरी नन्ही-सी बहन

अब मिलती है रक्षाबन्धन पर मुझसे
बाँधती है राखी कलाई पर दिल से
उस हर पल, जब रहती है मेरे पास बहन
करता हूँ झूठी कोशिशें, जीने की बचपन

गर दिया खुदा ने, मुझे फ़िर जीवन
तो लौटेगा मेरा, फ़िर से बचपन
तब माँगूँगा मैं उससे, मेरी बहन
चाहे लाख झगडे, कर लूँगा सहन

क्योंकि किस्मत वालों को ही, मिलती है बहन



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भारत जो हिल उठा तो





तूफ़ान-सा उठेगा, आँधियाँ जो थम गई तो
संसार जल उठेगा, भारत जो हिल उठा तो

वो 'अंग्रेज' भाग उठे थे, इतिहास जानता है
अखिल विश्व के गुरू हैं हम, ये विश्व मानता है
कर देंगे धूल में दफ़न, धैर्य जो टूटा तो

मत 'शेर' को सताओ तुम, रूँद जाओगे पैरों तले
मत छीनो हमारा अमन, बुझ जाओगे जले-जले
'भस्म' हो जाओगे गर मेरी, नजरें जो उठ गई तो

इक 'शाख' तो हिलती नहीं, 'वट-वृक्ष' काटने चले
'फूँक' में तो दम नहीं, 'जड़' उखाड़ने चले
'नाम' मिटा देंगे तेरा, 'भुज' जो तन उठी तो

करते अमन की प्रार्थना, तुम्हें भी मिले शांति
'रक़्त' रग़ में 'भारतीय', 'माँ' हमारी 'भारती'
'दम' दिखा देंगे तुम्हें, खून-खौल उठा तो



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Monday, August 12, 2013

हाँ तुम मेरे हो



इन बीते लम्हों में
कितना देख पाया हूँ तुम्हें
कभी देखा था एक बार जो
दिल में घर कर गया इतना
कि बार-बार उभरती
जीवंत तस्वीर तुम्हारी
उस खुशनुमा पल से
ना बाहर जाने देती है
ना अन्दर आने देती है
तेरी उस मस्त आवारगी में
खो दिया है अपने-आपको
ढूँढता हूँ तुम्हें हरपल
कहीं बातों में, कहीं यादों में
कहीं बागों में, कहीं ख़्वाबों में
उम्मीदें लिए हुए पलकें मेरी
निहारती हैं राहें
कि लौट आओगे एक दिन
मेरे खो चुके 'आज' के साथ
फिर कहोगे मुझसे
हाँ तुम मेरे हो
हाँ तुम मेरे हो


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Tuesday, July 16, 2013

फ़ैसला



यह सोचकर बदल
दिया फ़ैसला
कि उन्हें क्या कहते
जिनका मर चुका
जमीर
जो छोड गए
उस नन्हीं कली को
मरने
या बन गये जो
सौदागर

कि कहीं तो है वो
सुरक्षित
नहीं कुम्हल पाई जो
बस मर गया
वात्सल्य
क्या दे सकेगी
वो माँ किसी को
आँचल फ़िर से
या कह सकेगा
वो बाप अपने-आप को

क्य़ा कह सकेंगे
वो सलाहकार
कि खुदा होते हैं
माँ-बाप
या माँग सकेंगे
बहू अपने 'रत्नों' को
खुदगर्ज बनकर
कर दी जिन्होंने 'हत्या'
उन्हें मौत भी नहीं मिलेगी
रोते फ़िरेंगे मरने को


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Wednesday, July 3, 2013

केदारनाथ



बर्बादी का मंजर है, उन जवाँ वादियों में
जहाँ बरस पडा आसमाँ क़हर बनकर

वैसे जाते तो हैं लोग देखने खुदा
तोड़कर नियम खुश होते हैं मगर

वो है कहाँ समाज, कहता है 'सभ्य' स्वयं को
अब कुछ तो दे-दो सांत्वना उन्हें, जो लौटे हैं मरकर 

बैठकर महलों में, करते हो 'राजनीति'
कुछ ढाढ़स तो बँधाओ, उन 'लाशों' को जाकर

वो रहता है 'श्मशान' में, 'नाथ-ए-केदार'
मत बाँधने की कोशिश करो, मर जाओगे जलकर



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Friday, June 28, 2013

साँझ ढले



साँझ ढले, बाग में बैठे, जब-जब देखता हूँ
इन प्रेमी युगलों को, तो कभी खुशी,
कभी जलन होती है, कभी मैं तुझमें होता हूँ
कभी तू मेरी, यादों में होती है

कहीं हँसता हुआ, "प्रेम" देखकर
तेरी खिलखिलाहट, कानों में गूँजती है
कहीं हाथों में हाथ, नजर आते ही
तू सीने में, महसूस होती है

कितनी रौनक, यहाँ बाग में, फ़िर भी मैं तन्हा क्यों
तू नहीं है साथ मेरे, फ़िर भी है, मुझमें क्यों
ये वृक्ष भी शांत हैं, तन्हा, मेरी तरह
फ़िर भी इस, तन्हाई का दर्द, मुझे ही क्यों

मेरे शांत, निश्चल, जीवन में, क्यों तू हर जगह होती है
तेरा अक्स नजर, आता है मुझे, मेरी आँखें रोती हैं
जब तू ही जा चुकी, दूर मुझसे,
फ़िर क्यों तेरी, याद बाकी है

मैं करता हूँ प्रेम, कि प्रेम में हूँ
तू मुझमें है, कि मैं तुझमें हूँ
यूँ तो तेरी नजरें, दूर तक, कहीं नजर आती नहीं
फ़िर भी क्यों, मेरे खालीपन में, तू मुझमें होती है



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Wednesday, June 19, 2013

परमेश्वर साक्षात्-सा




एक विशाल छवि, व्यक्तित्व की
एक सरल ह्रदय, वात्सल्य का
एक गुरूर, स्वाभिमान का
एक समर्पण, आतिथ्य का
त्याग, सुकून का, संघर्ष, बलिदान का
कितना अभिमान, मुझे उन पर
कितना गर्व, मुझे उनका अंश होने पर

दिल, दर्पण-सा, चेहरा, रूआब का
भाव, अपनत्व का, प्यार, अमरत्व का
एक-एक पल उनके साथ का
मेरी हर सफलता में हाथ, आशीर्वाद का
एक आवाज, बुलंद-सी
एक शख्सियत, मिलनसार-सी

एक क्षमता, नेतृत्व की, एक दिल, मासूम-सा
एक बार भी नजरें मिलाने का, साहस नहीं मुझ में
वो कहानियाँ सुनाते मेरे पिता, हिम्मत की
मेरे पैर बाँधे, अपने पैरों में
मैं खामोश मगर उत्सुक और वो
ना जाने कैसे जान लेते, मेरी मन इच्छाओं को

मेरे माँगने से पहले, हाजिर कर
मेरे प्रश्न से पहले, उत्तर दे कर
मेरे गुस्से में, प्यार दे कर, मेरे रोने में, सिफारिश कर
मुझे खुशियाँ, स्व-गम भूलकर
बस ! देते गए प्रेरणायें, अच्छे की

स्वछन्द उड़ान भरता मैं, उनके खुले आसमान में
लाख दर्द सहकर भी, एक शिकन तक
ना आने दी, अपने चेहरे पर
कितना विशाल ह्रदय है उनका
परमेश्वर साक्षात्-सा



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Thursday, June 13, 2013

निमंत्रण




ओ नीले अम्बर, बरस-बरस
सूरज से रही है, आग बरस
तेरे प्रेम-मिलन की प्यासी यह
जलती धरती भी रही तरस

मरे जा रहे हैं, बाँध-नदी
और धूमिल हो रही हरियाली
घनघोर घटायें बरसाकर
कर दे वृक्षों की खुशहाली
देख तेरी ठंडी फुहार, लगती है जैसे हो अमरस

ये 'मनुज' बहुत ही निर्दयी है
मन में माया का प्रेम लिए
काट-काट जंगल इसने
'भू' के सीने पर घाव किए
यह नम्र-निमंत्रण है तुझको, आँगन, गलियारे, चौक बरस



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Tuesday, June 11, 2013

बस शब्दों का ही फेरबदल !




एक बानगी, चंद शब्दों की
एक मंजर, चंद लम्हों का
एक लेखनी, लिए हाथों में
हर बार ही कर, उलट - पुलट
उन चंद लम्हों को, शब्द दे कर
बना दी जाती है, एक कविता

गर उलटे हों शब्द, तो दुखमय मन
कोई रंज याद दिला देता
जो जुड़े शब्द सीधे - सीधे
मन ख़ुशी समझ, खुश हो जाता
ये समझ है कि नासमझी
जो दिखाती है रंज - ओ - ख़ुशी
बस चंद शब्दों का फेरबदल
जो मन में छल पैदा कर जाता

मन भाव, कितने सुखद - दुखद
इक छंद बदलते, बदल जाता
कुछ नए लम्हों के जुड़ने से
शब्दों का भाव बदल जाता
कोई हंसी - ख़ुशी, कोई व्यंग - बाण
कोई उन्मुक्त भाव को दर्शाता
बस शब्दों का ही फेरबदल
जो एक और कविता बना जाता




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Thursday, May 30, 2013

रूखसत




जानकर, मेरी खैरियत
तुमने मुझे कर दिया रूखसत

कुछ दिन अच्छे लगे, हम, हमारा साथ
और फिर नजर किया मुझमें, अपना, अपनी बरकत

जायजा कर, इम्तिहाँ लिए, मेरे हजारों बार
मुझे छोड़कर सब याद थे, तेरी ख़ुशी, तेरी हसरत

जताकर, मोहब्बत, तूने पाना चाहा 'चाँद'
मेरे इश्क की क्या औकात, वहाँ बस ! तू, तेरी शोहरत

देखकर, आवारगी, हँसकर मुझसे कहा
ना दौलत, ना शोहरत, फिर काहे  की उल्फत

छोड़कर, जाते समय, तूने देखी, सुर्ख आँखें मेरी
रोये ना तुम, बदले ना तुम, बदली ना तेरी फितरत

ना चाहकर, भी जाने दिया, याद आया वक़्त वो
कि तेरी ख़ुशी के लिए तुझे भी, कर दिया रूखसत



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Saturday, May 18, 2013

Inferior Thought




In a park, where I'm sitting,
A lot of children are playing
With each-other, doesn't matter.
No one knows about their cast,
No one can do interfere in their love.

Everyone enjoys it, having no thought.
Some guardians also sit, but no one
Ask about cast, they say play with love,
Live with love talk with love,
But one day when we’ll be elder,
Find us in a cast.

We’ll have no right to do love,
No right to live with love.
A child asked to me, “Uncle, who are you?”
I told her my name.

She again asked, no, no,
“What is your surname (cast)?”
I'm shocked, “What are we
Teaching our children? And why?”
Why we don’t teach them about two things

“Good” and “Bad” only……?


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वो




सूरज की हर एक किरण, मुझसे बस यही कहती है
और कोई मिले ना मुझको, बस ! वो मेरे दिल में रहती है

सीधी-सादी सी लगती है, वो, मेरे लिए सजाती-सँवरती है वो
चलती है, इस तरह जैसे, कानन में मृगयी चलती है

मोरनी-सी नाचे है वो, कोयल-सी कूके है वो
मेरी हर धड़कन बस ! उसके लिए धडकती है

परी जैसी दिखती है वो, मुझे सबसे प्यारी लगती है वो
मिल जाएँ उसे मेरी खुशियाँ भी, मेरे दिल की धड़कन कहती है



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Friday, May 17, 2013

अल्हड़पन






दीवाना हूँ मैं उस "नादान इश्क" का
जो हुआ था कभी, "अल्हड़पन" में
बेफिक्र हो जिन्दगी से जीना
कितना मजा है पागलपन में

जाने कब गिर गया मैं इस दरिया में,
डूबता गया और डूबता गया, प्रेम माधुरी की गहराई में
प्यार मिला, दर्द मिला, ख़ुशी मिली, तड़प मिली
कितना मजा है, चाहे लाख होंगे, "रंज-ओ-गम" इश्क में

नजरें झुक जाती कजरारी, टकराकर मेरी नजरों से
छिप जाता चेहरा मेरा, घनी जुल्फों की छाँव में
आज भी सिहर उठती है, "रूह"
कुछ अंदाज ही ऐसा था, लबों का, थरथराने में

कितना रास आया बाँहों का गुलिस्ताँ
तकिया भी बन गया है साथी, नींद में, लिपटने में
वो स्पर्श मेरे गालों पर, कोमल हाथों का
और दौड़कर सिमट जाना, मेरे सीने में

"प्यार" तो आज भी नादान-सा है
पर अब सब समाँ गया, "भूत" में
हर चीज से जुडा जो है "वो"
कि जीना अच्छा लगता है, "अल्हड़पन" में



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