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Saturday, September 7, 2013

शिक्षा का महत्त्व




शि = शिक्षावान
क्ष = क्षमाशील
क = कर्मवान

हमारा भारत देश त्यौंहारों एवं परम्पराओं से भरा हुआ देश है। समय-समय पर इस धरती पर अनेकों संतों-महात्माओ-गुणीजनों ने जन्म है लिया और इसका मान बढाया है। राम-रहीम की एकता एवं गंगा-जमुनी संस्कृति लिए हुए हमारे समाज में गुरू (शिक्षक) का महत्वपूर्ण स्थान है।
   शिक्षक दिवस हमारे देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस (5 सितम्बर) के उपलक्ष में मनाया जाता है। आप भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक और एक आस्थावान हिन्दू विचारक थे। राजनीति में आने से पहले उन्होंने अपने जीवन के 40 वर्ष अध्यापन में व्यतीत कर भारतदेश का भविष्य गढा। वे स्वतन्त्र भारत के दूसरे राष्ट्रपति थे एवं उपराष्ट्रपति भी रहे। यह उनकी ही इच्छा थी कि उनका जन्मदिन उनके नाम से नहीं मनाकर "शिक्षक दिवस" के रूप में मनाया जाये। सन् 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया।
   एक समय हुआ करता था जब आश्रम परम्परा के अंतर्गत माता-पिता अपने बच्चों को "ज्ञान-प्राप्ति" के लिए गुरूकुलों में भेज दिया करते थे जिसमें बच्चे ब्रह्मचर्य आश्रम में गुरू का सानिध्य पाकर ज्ञान प्राप्त करते थे एवं दीक्षा पूर्ण होने के बाद ही घर लौटते थे, लेकिन आज स्थिति एकदम उलट हो चुकी है,एक ओर जहाँ गुरूकुल परम्परा समाप्त हो चुकी है, वहीं बच्चे बस्ते के बोझ के नीचे दबे जा रहे हैं जिन्हें केवल नम्बर लाना, परसेण्टेज बनाना सिखाया जाता है। उसे ज्ञान हुआ या नहीं, इस बात से कोई फ़र्क नहीं पडता। 
   "गुरू" शब्द का अर्थ है --
गु - अंधकार
रू - दूर करने वाला
   अर्थात् व्यक्ति के जीवन से अंधकार दूर कर उसे ज्ञान प्रदान करने, सद्मार्ग पर प्रशस्त करने का कार्य करने वाला व्यक्ति गुरू कहलाता है।
   वर्तमान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के युग में क्लासरूम्स वर्चुअल हो चुके हैं एवं गुरूजी, सर हो गये हैं। कक्षा में सर्वाधिक नम्बर लाने की महत्ता बढती जा रही है जिसके तले आज का विद्यार्थी जीवन बुरी तरह दब चुका है। बच्चे के पैदा होते ही उसे डॉक्टर-इंजीनियर की संज्ञा दे-दी जाती है। माता-पिता को इस बात से फ़र्क पडने लगा है कि पडोसियों के बच्चों के अच्छे नम्बर आते हैं या वे किसी कोर्स में चयनित हो चुके हैं। इन बातों ने बच्चों से उनका बचपन तो छीना ही है, साथ ही वे रिश्तों का महत्व, भारतीय संस्कृति, हमारा परिवेश आदि सभी चीजों को भूल चुके हैं। कभी पैर छूकर बडों का आदर करने वाले बच्चे आज पहली बात तो किसी से मिलते ही नहीं है और या फ़िर मिलते भी हैं तो हैलो-हाय से ही काम चला लेते हैं। माता-पिता बच्चों से अपने सपने पूरे करने की उम्मीदें लगाकर बच्चों को मशीन-माफ़िक बना चुके हैं। शिक्षक विद्यालयों में केवल कोर्स पूरा करवाने का कार्य करते हैं। बच्चों के चरित्र-निर्माण जैसी बातों में उनकी कोई रुचि नहीं है।
   मेरे आदर्श गुरूजी, राज्यपाल एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित श्री छुट्टनलाल जी सैनी हैं जिनके मार्गदर्शन में मेरी प्राथमिक शिक्षा पूरी हुई, जिनकी आदर्शवादिता का सानी मैं ही नहीं मेरे जैसे वो सभी विद्यार्थी एवं हैं जो उनसे शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं एवं वर्तमान में कर रहे हैं। ना जाने कितने विद्यार्थियों का भविष्य उनके हाथों सँवर चुका है एवं ना जाने कितनों को उनका मार्गदर्शन प्राप्त होगा। संस्कृत विद्यालय में पढने के दौरान उनसे प्राप्त की शिक्षा का असर, मुझ पर आज तक भी कायम है। अच्छा ज्ञान प्राप्त करने के लिए वे ना जाने कितने ही उपक्रम किया करते थे। छात्र-छात्राओं, सभी से उनका आत्मीय व्यवहार, बेहद सुन्दर था।
   उम्मीद है कि भविष्य में माता-पिता या संरक्षक बच्चों के चरित्र-निर्माण पर जोर देंगे एवं उन्हें ज्ञान-प्राप्ति के मार्ग पर प्रशस्त करेंगे ! जिससे भारतीय संस्कृति एक बार फ़िर से जीवंत हो उठेगी ! अन्यथा नम्बर-बोझ की दौड के आगे इस तरह शिक्षक दिवस मनाने का क्या औचित्य ! जिन बच्चों को डॉ. राधाकृष्णन के बारे में कुछ नहीं पता, जो हर दिवस को , हर त्यौंहार को एक छुट्टी के नजरिये से देखते हैं, उन्हें क्या पता भारतीय संस्कृति एवं आदर्शवादिता का महत्व !



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Saturday, July 27, 2013

रोता आसमाँ... धरती की दुर्दशा पर…




बारिश आ गई…बारिश आ गई…
    यह शब्द हर शख्स के मुँह से सुना जा सकता है जब बारिश आती है, चाहे वह ऑफ़िस में कार्य करता कर्मचारी हो या फ़िर कच्चे घर की टूट-फ़ूट को सुधारता बाशिन्दा। सभी के चेहरे पर खुशी छा जाती है। जिसका लुत्फ़ बच्चे, बडे सब उठाते हैं। वैसे तो बारिश खुशी एवं सम्पन्नता का प्रतीक होती है, लेकिन आज सम्पन्न कौन है तथा खुशी किसको है, यह जानना बहुत आवश्यक है।
       जो सम्पन्न हैं, बारिश केवल उन्हीं के लिए ही खुशी का प्रतीक है। कॉलेज जाने वाले स्टूडेण्ट्स के लिए बारिश लुभावनी हो सकती है, लेकिन रिक्शा चलाने वालों के लिए नहीं; अपार्टमैण्ट्स में रहने वाले लोगों के लिए आकर्षक हो सकती है, लेकिन फ़ुटपाथ पर सोने वालों के लिए नहीं।
       क्यों ? क्या इन लोगों के लिए कोई दूसरा भगवान होता होगा आसमान में ? क्या इनके लिए दूसरी सरकार बनाई जानी चाहिए ? क्या ये लोग भारतीय/ इंसान नहीं ? हर वर्ष एक बजट पारित होता है, हजारों योजनाएँ बनती हैं, अनेकों घोषणाएँ होती हैं कि गरीबों को घर, मुफ़्त भोजन, रैन-बसेरे वगैरह-वगैरह, लेकिन वह सब क्यों नहीं मिल पाता इन लोगों को ? हर बार क्यों होते हैं घपले ? और घपले होने पर जाँच के नाम पर क्यों बना दी जाती है, समिति ? क्या उस घोषणा/योजना के बचे-खुचे को डकारने के लिए ?
     शहर के सभी रास्तों को इंतजार है बारिश आने का, जिससे लोगों में भ्रम पैदा हो जाये कि यहाँ सडक है और वे अपनी जीवन-यात्रा पूरी कर लें। अनेकों स्कीम्स बनती हैं सडकों, नालों आदि के लिए, सडक किनारे वृक्षारोपण के लिए, लेकिन ना तो कहीं पर सडकें ही हैं और ना ही कहीं पर नाले। उल्टा सडकें ही नाले बनी हुई नजर आती हैं। रही बात वृक्षारोपण की तो नये पौधे तो बहुत दूर की बात हैं, इसके उलट जो पेड पहले से लगे हुए हैं, 'सौन्दर्यीकरण' के नाम पर उनको और काट दिया जाता है। शहर में 'कॉलोनाइजर्स इफ़ैक्ट्स' के चलते कहीं भी कॉलोनी बनाई जा सकती है, सरकारी/नदी-नालों की जमीन पर भी।
      पहले तो जो लोग अवैध कब्जे करते थे उनके खिलाफ़ पुलिस या प्रशासन कार्यवाही भी करता था लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है, अब या तो कब्जा कोई प्रशासनिक व्यक्ति ही करता है या फ़िर 'पहुँच' वाले भी बहुत लोग हैं जिनके खिलाफ़ आवाज उठाना बेहद गम्भीर हो सकता है ! 
    हर वर्ष इतनी बारिश होती है कि यदि उसका सही प्रबन्धन हो तो आने वाले एक-दो वर्षों तक पानी की कमी नहीं रहे। लेकिन बहाव क्षेत्रों में बढ रहे अतिक्रमणों के कारण नदी-बाँध सूखे के सूखे रह जाते हैं एवं आने वाले वर्ष तो बहुत दूर की बात है, वर्तमान वर्ष में ही पानी की कमी की मार झेलनी पडती है तथा जल की कमी के कारण अक्सर लोगों की लडाई देखने या सुनने में आती है।
      पानी की बचत करने के लिए लोगों को अपने व्यक्तिगत स्तर पर भी प्रबंध कर वर्षा जल संरक्षण करना चाहिए। अक्सर लोग बहुमूल्य पानी की बर्बादी अपने वाहनों को धोने में करते हैं, उन्हें भी पानी की कीमत को समझना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य होना चाहिए कि वह अपने जीवन में दस वृक्ष कम से कम लगाए।
     मानव जीवन में वृक्षों का अहम योगदान है एवं लोग आजकल वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई कर प्रकृति के नियमों  की अवहेलना कर रहे हैं जिसका खामियाजा पहले भी भुगतते रहे हैं और आगे भी भुगतते रहेंगे। अब वर्षा होती तो है लोगों को सुकून का अहसास भी कराती है लेकिन एक नजरिये से देखा जाये तो लगता है जैसे आसमाँ रो रहा हो धरती की दुर्दशा पर।
वो कहते हैं, निखर उठी है धरती फ़ुहारों से
हमने कहा- देखकर कुरूप वसुधा, रोता है आसमाँ



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Saturday, July 6, 2013

तलाश - एक स्वच्छ राह की…





हाईटेक जयपुर… वर्ल्डक्लास जयपुर… महानगर जयपुर…
              और भी ना जाने कितने ही नाम दिये जा चुके हैं जयपुर को। कुछ महिनों में तो यहाँ मेट्रो ट्रेन चलाने की कवायद भी जारी है, लेकिन क्या जयपुर में कहीं गुलाबी नगर भी बसा है ? हर जगह अगर नजर आती है तो बस गंदगी, अतिक्रमण और कचरे के ढेर, जिन्हें देखकर एक ही प्रश्न आता है मन में, "क्या जयपुर इसके लायक भी है ?"
               केवल जे.एल.एन.मार्ग को छोड़कर जयपुर की एक भी सड़क ऐसी नहीं है जो अतिक्रमण मुक्त हो, जिसमें परकोटे के अन्दर की तो बात ही निराली है। कहीं पर सड़कें दुकानदारों की साज-सज्जा में न्यौंछावर हैं, तो कहीं ठेलेवालों की खिदमत करती नजर आती हैं। कुछ लोग तो गायों को चारा भी सड़क पर ही डालते हैं, जिससे चारों तरफ गंदगी का आलम नजर आता है और हादसा होने की स्थिति अलग। बस, टैक्सी, रिक्शा-ऑटोरिक्शा सब सडकों को अपना घर समझकर चाहे जहाँ खड़े हो सकते हैं। ऐसी बात नहीं है कि पुलिस या प्रशासन को इस बात की जानकारी नहीं है। कहने को तो सभी अपनी ड्यूटी में मुस्तैद नजर आते हैं, लेकिन क्या फर्क पड़ता है, अगर इतनी बड़ी सड़क पर थोडा-सा अतिक्रमण हो जाए तो।
               लो-फ़्लोर बसों के लिए बनाए गए बस स्टॉप्स पर टैम्पो वाले, निजी बसों वाले अवैध कब्जा जमाये बैठे हैं जिसकी वजह से लो-फ़्लोर बसें सवारियों को या तो बस स्टॉप से पहले ही उतार देती हैं या फ़िर उन्हें सडक के बीच में उतरना पडता है। इस गफ़लत में या तो सवारियों को बस मिलती नहीं है या कोई सडक के बीच उतरने पर दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है (एसएमएस अस्पताल के सामने आसानी से देखा जा सकता है) जिसके अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं।
                शहर के दूसरे हिस्सों के भी यही हाल हैं। सड़कें गलियाँ बन चुकी हैं। मुख्य सड़कों को जोड़ने वाली सड़कों की स्थिति एकदम बदहाल है। फल-सब्जियों वाले, जूस वाले, चाय वाले चाहे जहाँ कचरा डाल सकते हैं, जो कि शहर की "सुन्दर सड़कों" की खूबसूरती और बढ़ा देती है। ऊँचे-ऊँचे घरों में रहने वाले लोग भी अपने घर को सुन्दर दिखाने की होड़ में घर की केवल अन्दर से सफाई कर देते हैं और कचरा 'सड़क' पर फेंक दिया जाता है जिसका भार वहन करती है, 'बेचारी सडक'। क्योंकि हमारे यहाँ कचरा प्रबंधन 
की ना तो जेडीए या नगर निगम को परवाह है और ना ही सरकार को। और हो भी क्यों ? जनता के सेवक हैं, कचरे के थोडे ही हैं। वैसे जनता भी केवल अपने सेवकों को बस दूर से ही देख सकती है, पास गए तो अंजाम भी भुगतना पड सकता है।
                शहर को हाल ही में जिस 'सुरंग' से जोडा गया है, वह तो बहुत सुन्दर है, लेकिन थोडे आगे बढें, तो ट्रांसपोर्ट नगर जायें चाहे जवाहर नगर बायपास; दोनों तरफ़ अतिक्रमणों की बाढ आई हुई है। मानसून आ चुका है, फ़िर भी प्रशासन कचरे को बेघर नहीं करवाना चाहता क्योंकि नाले, कचरे का घर बने हुए हैं और पानी बहता है सडक के ऊपर से। कई जगहों पर तो बेचारी सडकों को गड्ढों ने लील लिया है, जहाँ अगर पानी भरा, तो पता नहीं कब, किसका सुहाना सफ़र मातम में बदल जाए।
                 इतना सब कुछ है फ़िर भी एक उम्मीद हमेशा रहती है कि कभी तो कोई लोकसेवक, कोई सरकार, कोई अधिकारी इनकी सुध लेगा या फ़िर कभी तो सोई हुई जनता जागेगी, सोये हुए प्रशासन को जगाने के लिए, अतिक्रमियों को भगाने के लिए, गंदगी फ़ैलाने वालों को सबक सिखाने के लिए, तब हमारा जयपुर हाईटेक भी बन सकेगा व वर्ल्डक्लास भी और तब यहाँ नजर आएँगी स्वस्थ राहें।



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Saturday, June 22, 2013

प्राकृतिक आपदा; जिम्मेदार कौन ? मानव या प्रकृति !





प्राकृतिक आपदा या आकस्मिक जोखिम या मानव निर्मित संकट (जैसे- भूकम्प, बाढ, आग, युध्द्, दंगे आदि), इन सबके लिए हम प्रकृति या भगवान को दोष देते हैं, लेकिन हम स्वयं इन घटनाओ के लिए कितने जिम्मेदार हैं, यह हम कभी नहीं सोचते। हाल ही में उत्तराखण्ड में आई बाढ, एक नजरिये से देखा जाए तो प्राकृतिक कहर है, लेकिन ऐसा क्यों हुआ, यह किसी ने नहीं सोचा।
        आए दिन सुन्दरता के नाम पर हो रही प्रकृति से छेडछाड, वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई, नदी-नालों से खिलवाड, विकास के नाम पर पहाडी क्षेत्रों में कल-कारखानों की स्थापना, पर्यावरण के नियमों को ताक पर रख भवनों का धडल्ले से निर्माण, कचरे का समुचित प्रबन्ध नहीं होना आदि अनेक मानव निर्मित कारण हैं, जिसके परिणाम सभी को भुगतने पडते हैं।
         आपदा (आकस्मिक संकट), एक प्राकृतिक या मानव निर्मित जोखिम का प्रभाव है जो पर्यावरण या समाज को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। इसके लिए प्रकृति से कहीं अधिक मानव जिम्मेदार है। लापरवाही, भूल या व्यवस्था की असफलता, तकनीकी आपदा जैसे- इंजीनियरिंग असफलता, यातायात आपदा या पर्यावरण आपदा, अत्यधिक धुंएँ के कारण जीवन रक्षक ओजोन परत में ब्लैक होल्स का हो जाना आदि अनेक संकट मानव निर्मित ही हैं।
           हम यह कहकर बच नहीं सकते कि ये घटनाएँ प्राकृतिक हैं, प्रकृति से हमें हर चीज मिलती हैं, फ़िर भी हम स्वार्थवश प्रकृति को नुकसान पहुँचाते हैं। हमने प्रकृति को कितना दिया है, क्या दिया है, यह कभी नहीं सोचते। आज प्रमुख पर्यटन स्थलों की वास्तविक स्थिति बहुत ही गम्भीर है, जिसके लिए हम सरकार को कोसते हैं। क्या यह हमारी जिम्मेदारी नहीं है कि उनमें सुधारात्मक प्रयास करें ? और अगर सुधार नहीं भी कर सकते तो बिगाडें भी क्यों ?
         पुराने समय में लोग वृक्षों को बहुत अधिक महत्व देते थे, उन्हें देव समझकर पूजा करते थे (राजस्थान का चिपको आन्दोलन इसका एक बहुत बडा उदाहरण है), लेकिन आज स्थिति एकदम उलट है, वृक्ष केवल पार्कों, उद्यानों में दिखाई देते हैं, घरों के आगे लगे वृक्षों की जगह साधनों ने ले-ली है। घर से दस कदम दूर जाने के लिए भी लोग कार, मोटरसाइकिल आदि का प्रयोग करते हैं। शहरों में साँस लेने के लिए शुध्द हवा तक नहीं मिल पाती। अपने घरों को सुन्दर बनाने वाले 'सभ्य-नागरिक' सडकों पर, नालों में कचरा फ़ेंक देते है, जो या तो वहीं पर सडता रहता है या बहकर नदियों में चला जाता है, जिससे जल प्रदूषित होता है।
            एक अन्य प्रमुख कारण भी है, जिसके लिए मनुष्य जिम्मेदार है, अवैध खनन। इसके कारण नदी-नालों का बहाव क्षेत्र परिवर्तित हो चुका है एवं नदी-नाले जो कि वर्षपर्यन्त बहते रहते हैं, आज उनमें केवल बारिश के दौरान ही पानी दिखाई देता है। पहाडों में हो रहे अवैध खनन के कारण पहाड धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं, जो कि प्रकृति के साथ बहुत बडा खिलवाड है।
            बारिश के दौरान जो वृक्ष कभी मिट्टी के कटाव को रोकते थे, वे आज अतिक्रमण, भू-माफ़िया, अवैध कब्जों, 'प्लॉटिज्म' की भेंट चढ चुके हैं। (जयपुर का रामगढ बाँध इसका ज्वलंत उदाहरण है) ऐसे ही अनेक उदाहरण जिससे प्रकृति के साथ खिलवाड हो रहा है, वे हम, हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी में देख सकते हैं एवं यह भी जानते हैं कि उन सबके लिए हम किस हद तक जिम्मेदार हैं।
            प्रशासनिक एवं सरकारी अधिकारी-कर्मचारी अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह होते जा रहे हैं, जिसके कारण आज सब जगहों पर कचरा, अतिक्रमण, वृक्षों की कटाई, अवैध खनन आदि अनेक प्राकृतिक नियमों की अवहेलना की जा रही है, जिसके परिणाम बहुत ही गम्भीर होंगे।

           अभी-भी वक्त है, जागने का, एक सबक लेने का, अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने का, प्रकृति को प्रकृति वापस लौटाने का  अन्यथा वह दिन दूर नहीं, जब धरती का सामना प्रलय से होगा और तब हर जगह होगा 'केदारनाथ'



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Saturday, June 15, 2013

भारत माँ की बेटी



ना जाने क्या होता जा रहा है, आजकल की युवा पीढी को। देखिये ना मिश्रा जी सडक पर, कैसे वो लडकी, उस लडके का हाथ पकड कर चल रही है।
मिश्रा जी ने उस ओर देखा, देखते ही अपने दोनों कानों पर हाथ लगाने लगे- राम-राम-राम-राम-राम। कैसा घोर कलयुग आ गया है, गुप्ता जी। एक हमारा समय हुआ करता था और एक आज का समय है।
अजी मैं तो आपसे पहले ही कह रहा था न, कि युवा पीढी हमारी संस्कृति को लेकर डूबेगी। पता है, वो जो अपनी कॉलोनी में सबसे आखिरी वाला घर है ना, उस घर की बडी बेटी ने भागकर किसी से शादी कर ली। हमें तो बीस दिन बाद पता चला, जब उनके घर डीजे बज रहा था तब। हमारे घर भी न्यौता आया था, लेकिन जब हम वहाँ पहुँचे, तो पता चला कि माजरा क्या है !
क्या पता चला, गुप्ता जी ! शर्मा जी ने बडे ही विस्मय से पूछा।
ये ही कि वो जो लडकी घर से भागकर गई थी, उसको उसके पति सहित  'बाप' ने अपना लिया। मैं तो तुरन्त ही अपने परिवार को वापस लेकर आ गया। ऐसे माहौल में अगर हमारे बच्चे रहेंगे, तो क्या सीखेंगे। बस, यही सोचकर, मैंने उस परिवार से रिश्ता तोड लिया। गुप्ता जी ने एक ही साँस में अपनी बात पूरी की।
अजी बहुत अच्छा किया और क्या करते, आपकी जगह मैं होता तो, मैं भी यही करता, जो आपने किया।
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तीन चीजें होती हैं, मिश्रा जी, भोजन, भजन एवं औरत; तीनों ही परदे की चीज होती हैं। आज लडकी घर से बाहर क्या निकली, पंख लग गये हों जैसे। हमारे जमाने में औरत, घर से बाहर नहीं निकल सकती थी, आज जींस-टीशर्ट पहनें घूमती हैं। ना जाने क्या हो गया इस देश की युवा पीढी को ?
इस लडकी को देखो, जो आपके बगल में खडी है गुप्ता जी, कैसी सभ्यता और संस्कृति की मूर्ती है, ये (सलवार-सूट) भी तो परिधान हैं, इनमें क्या शर्म है ?
क्या नाम है, बेटी आपका ? मिश्रा जी ने पूछा।
क्यों, क्या काम है ? लडकी ने त्यौंरियाँ चढाते हुए पूछा।
मिश्रा जी ने इस तरह के उत्तर की कल्पना भी नहीं की थी, का मानो खून सूख गया हो, गुप्ता जी का मुँह ताकते हुए बोले- वो मैंने ऐसे ही पूछ लिया था।
क्या जवाब दूँ आपको ! कितनी देर से सुन रही हूँ, आपकी बकवास।
अरे बेटी बडे-बूढों का लिहाज तो करो, कम-से-कम। गुप्ता जी थोडे तेज आवाज में बोले।
तब तक बस में सभी की नजरें उनकी तरफ़ हो गई थी।
लिहाज करवाने लायक हो क्या आप ? लडकी ने अपनी आँखें गुप्ता जी की तरफ़ कर ली।
हम तो ये कह रहे थे कि तुम कितनी सभ्य हो, हम तो तुम्हारी …
लडकी गुप्ता जी की बात बीच में काटकर बोली-
मेरी बात करने की कोई जरूरत नहीं है। मैं उन लोगों का सम्मान नहीं करती, जो औरत को चीज समझते हैं। भोजन, भजन और औरत, क्यों, यही सिखा रहे थे ना अभी आप ! आज लडकियाँ पढने लग गई, तो आपको ऐतराज हो गया। आपकी कॉलोनी की लडकी ने भागकर शादी कर ली, क्यों, पता किया, उसका बाप भी कोई आपके जैसा ही होगा। आज जब आप लोगों की इच्छा पूर्ति नहीं हो रही, तो उसका दोष युवा पीढी को देना शुरू कर दिया। एक बाप की खुशी तो अपने बच्चों में होनी चाहिए ना, आप लोगों ने तो बच्चों को अपनी खुशी पूरी करने का जरिया बना डाला। बेटा चाहे लाख आवारा हो, बेटी-बहू को परदे में रखोगे हमेशा।
अब एक बात बताइये, आपकी माँ, पत्नी, बेटी, बहू सब औरत ही हैं ना, क्या वो भी चीज हैं, जिनसे जो मन में आया कह दिया !
बेटी मेरा मतलब वो नहीं था, मैं तो…
लडकी मिश्रा जी की बात की परवाह करते हुए बोली-
खूब अच्छी तरह जानती हूँ, आपका मतलब। आप जैसे लोगों की वजह से ही बेटियाँ आगे नहीं बढ पा रही हैं। राजा बना के बैठा देना चाहिए आपको और आपके बगल तीन रानियाँ बिठा देनी चाहिए और चार दासियाँ आपकी सेवा में लगा देनी चाहिए।
मिल गया उत्तर या और कुछ बाकी है।
लडकी आगे बढी, उतरने के लिए, तब गुप्ता जी ने अपनी नजरें शर्म से नीची करते हुए, रूँधे हुए गले से पूछा- बेटी नाम तो बताती जाओ अपना।
उतरते हुए लडकी बोली, मेरा नाम है…

भारत माँ की बेटी



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Wednesday, June 5, 2013

परि+आवरण = पर्यावरण

अर्थात हमारे चारों ओर का आवरण ।



परिभाषाओं में शायद सभी जानते होंगे कि पर्यावरण क्या होता है या किसे कहते हैं ? लेकिन परिभाषा जानना ही पर्यावरण को जानना नहीं है।
   'विश्व पर्यावरण दिवस' का आयोजन मात्र एक रस्म अदा करना है। भले ही इस अवसर पर हज़ारों पौधे लगाए जाएँ, पर्यावरण संरक्षण की झूठी क़समें खाई जाएँ, लेकिन इस एक दिन को छोड़ शेष 364 दिन प्रकृति के प्रति हमारा उदासीन व्यवहार पर्यावरण के प्रति हमारी संवेदनहीनता को प्रदर्शित करता है। आज हमारे पास ना तो शुद्ध पेयजल है और ना ही साँस लेने के लिए शुद्ध हवा । जंगल खाली होते जा रहे हैं, जल के स्रोत समाप्त हो रहे हैं, वनों में रहने वाले वन्य जीव भी लुप्त होते जा रहे हैं। बढ़ते औद्योगीकरण के कारण खेत-खलिहान और वन नष्ट होते जा रहे हैं। कल-कारखानों से निकलते धुएँ से प्राणवायु दूषित हो रही है।
   अगर आदर्श पर्यावरण की बात करें, तो भारत सरकार द्वारा सन 1952 ई. में निर्धारित "राष्ट्रीय वन नीति" के तहत हमारे देश के 33.3% क्षेत्र पर वन होनें चाहिए, लेकिन वास्तविकता इसके एकदम विपरीत है। वर्तमान समय में भारत में केवल् 19.39% भूमि पर ही वनों का विस्तार है। 19 नवंबर 1986 से पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू हुआ। जिसके अनुसार जल, वायु, भूमि - इन तीनों से संबंधित कारक तथा मानव, पौधों, सूक्ष्म जीव, अन्य जीव आदि पर्यावरण के अंतर्गत आते हैं।
  हमारे देश की सत्तर प्रतिशत आबादी गाँवों में रहती है, जो कि शहरों की ओर पलायन कर रही है। जबकि शहरी जीवन तो वहाँ से भी बुरा है, जहाँ हरियाली कहीं दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। जंगलों की जगह बहुमंजिली इमारतों ने ले-ली हैं। धरती का तापमान निरंतर बढ़ने के कारण भारत में 50 करोड़ से भी अधिक पाए जाने वाले जानवरों में से पांच करोड़ प्रति वर्ष मर जाते हैं। वन्य प्राणियों  की घटती संख्या पर्यावरण के लिए घातक है, क्योंकि वे प्राकृतिक संतुलन स्थापित करने में सहायक होते हैं। अत: पर्यावरण की दृष्टि से वन्य प्राणियों की रक्षा आवश्यक एवं अनिवार्य है। इसके लिए सरकार एवं लोगों को वन-संरक्षण और वनों के विस्तार की योजना पर गंभीरता से कार्य करना होगा। लोगों को वनीकरण के लाभ समझा कर उनकी सहायता लेनी होगी।
    पर्यावरण की अवहेलना करने के कारण आज अनेक तरह के प्रदूषण हो रहे हैं, जिनमें से प्रमुख कुछ प्रदूषण निम्न हैं--

पर्यावरण प्रदूषण:
पर्यावरण के प्रदूषित होने के मुख्य कारण लगातार बढती आबादी, औद्योगीकरण, वाहनों द्वारा छोड़ा जाने वाला धुआँ, नदियों, तालाबों में गिरता हुआ कचरा, वनों का कटान, खेतों में रसायनों का असंतुलित प्रयोग, पहाड़ों में चट्टानों का खिसकना, मिट्टी का कटान आदि हैं, जिसका सीधा-सा सम्बन्ध वृक्षों की कटाई से है।

जल प्रदूषण:
पृथ्वी के तीन चौथाई भाग पर जल होने के बाद भी केवल 0.3 फीसदी जल ही पीने योग्य है तथा प्रदूषण के कारण 0.3 फीसदी का भी 30 फीसदी जल ही वास्तव में पीने के लायक़ बचा है। निरंतर बढ़ती जनसंख्या, पशु-संख्या, औद्योगीकरण, जल-स्रोतों का दुरुपयोग, कारखानों से निष्कासित रासायनिक पदार्थ, वर्षा में कमी, शव तथा मृत जानवर नदी में फेंक देना, कृषि-उत्पादन बढ़ाने और कीड़ों से रक्षा में प्रयुक्त रासायनिक खाद एवं कीटनाशक, नदियों, जलाशयों में कपड़े धोने, कूड़ा-कचरा फेंकने व मल-मूत्र विसर्जित करने आदि के कारण जल प्रदूषित होता रहा है।

भूमि प्रदूषण:
वनों का विनाश, खदानें, भू-क्षरण, रासायनिक खाद तथा कीटनाशक दवाओं का उपयोग आदि के कारण भूमि प्रदूषण बढ़ रहा है। मृदा, जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम पर्यावरण की रक्षा के लिए अनिवार्य है।

ध्वनि प्रदूषण:
मशीनों, लाउडस्पीकरों, कारों, अनियंत्रित जनसंख्या, शहरों में यातायात के विविध साधनों, टेलीफोन और मोबाइल पर तेज आवाज में बातें कर, सामाजिक एवं सांस्कृतिक समारोहों में ध्वनि विस्तारक यंत्रों तथा कल-कारखानों के कारण ध्वनि प्रदूषण एक उग्र रूप धारण कर चुका है, जिसके कारण लोगों में चिडचिडापन, गुस्सैल प्रवत्ति, बच्चों में बहरापन एवं अनेक बीमारियाँ पैदा हो रही हैं।

वायु प्रदूषण:
घरेलू ईंधन, वाहनों की बढ़ती संख्या और औद्योगिक कारखानें वायु प्रदूषण के प्रमुख कारक हैं।

पर्यावरण संरक्षण कैसे करें --
अधिक से अधिक वृक्ष लगाएँ।
निजी वाहनों का उपयोग अधिक नहीं करते हुए सार्वजनिक साधन प्रयोग करें।
वर्षा जल संग्रहण अपनाएँ।
उपयोग नहीं होने पर बिजली व्यर्थ ना जलाएँ।
रेडियो-टीवी आदि की आवाज धीमी रखें।
फोन पर बात करते समय धीमी आवाज में बात करें।
पानी बर्बाद ना करें।
पॉलिथीन का उपयोग न करते हुए, कचरा, कचरा पात्र में ही डालें।

अपने जन्मदिन, विवाह की वर्षगाँठ या अन्य किसी यादगार मौके पर पौधारोपण करें एवं अन्य लोगों को भी इसका महत्व समझाएँ तथा उपहार में भी पौधे ही दें।



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Wednesday, May 15, 2013

सरकारी अस्पतालों में हो रहा मानवाधिकारों का हनन !




यूँ तो ‘अस्पताल’ शब्द सुनते ही सेवाभाव का स्मरण हो जाता है, मगर शहर के अस्पतालों की स्थिति पर नजरडाली जाए, तो वहाँ सेवा तो बहुत दूर की बात है, कोई प्यार से बातचीत तक नहीं करता। सरकारी अस्पतालों में उपस्थित स्टाफ की बोली, भाषा इस तरह की हो चुकी है कि शायद ही कोई वहाँ इलाज कराना चाहेगा !
आज सरकार ने अनेक योजनाएँ चला रखी हैं, जैसे- मुफ़्त जाँच, मुफ़्त दवाइयाँ, आदि। लोग इनसे लाभान्वित भी होते हैं, मगर सरकारी अस्पतालों में कार्य करने वाले स्टाफ़ का व्यवहार बहुत ही रूखा हो चुका है। यहाँ तक की पीज़ी कर रहे डॉक्टर्स भी बद्तमीजी से बात करते नजर आते हैं। उन्हें किसी भी मरीज से कोई सहानुभूति नहीं, चाहे पुरुष हो या महिला। सबसे पहली बात तो ये कि आज अधिकांश सरकारी अस्पताल स्टाफ़ की कमी से जूझ रहे हैं और दूसरी बात ये कि जो डॉक्टर सेवारत हैं, उन्हें अपने क्लीनिकों से फ़ुर्सत नहीं है। इसके बाद रही-सही कसर अस्पताल का नर्सिंग स्टाफ़ पूरी कर देता है। अस्पताल में सुरक्षा के लिए ड्य़ूटी देने वाले गार्ड्स मरीजों के परिजनों से अभद्र भाषा का प्रयोग कर बात करते हैं। क्या ये सब मानवाधिकारों का हनन नहीं है? भारतीय संविधान के अनुसार देश में हर किसी को इज्जत से जीने का अधिकार है, तो फ़िर क्या अस्पताल ‘मानवाधिकार’ या ‘इज्जत’ से बाहर हैं?
शहर के सरकारी अस्पतालों में आने वाले अधिकतर मरीज गाँवों से आते हैं। लोगों को लगता हैं कि बडे अस्पतालों में सभी सुविधाएँ उपस्थित होती हैं, जिससे उनके परिजनों को बेहतर इलाज उपलब्ध हो सकेगा, ऐसी उम्मीद लगाकर लोग इलाज के लिए आते हैं। लेकिन यहाँ तो स्थिति ही इसके एकदम विपरीत है। लम्बी-लम्बी लाइनें, अस्पताल परिसर के बरामदों में पडे हुए मरीज, वार्डों में टूटे, जंग खाये हुए पलंग, फ़टे हुए बिस्तर, पान-गुटखा से रंगी हुई दीवारें, बस ! यही हाल है सरकारी अस्पतालों का। ना तो इस राज्य सरकार का कोई ध्यान है और ना ही किसी स्वयंसेवी संस्था का !
कभी अपने नर्स होने के आदर्शवाद को स्थापित करते हुए मदर टेरेसा ने अपने निजी जीवन का तक त्याग कर दिया था, वहीं आज अस्पतालों में उपस्थित नर्सों का बेरुखा व्यवहार देखकर ऐसा लगता है, जैसे मरीज होना कोई अपराध है। गर्भवती महिलाओं से अस्पताल स्टाफ़ की बद्तमीजी आए दिन देखने को मिलती है। उन्हें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पडता कि महिला के साथ आया व्यक्ति, चाहे उनका पिता हो, भाई हो या कोई और ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है कि बाप-बेटी (भाई-बहन या कोई अन्य) एक दूसरे से नजरें तक नहीं मिला पाते। अस्पताल में ड्यूटी करता गार्ड रात को शराब के नशे में पाया जाता है, जो बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं को अस्पताल के दरवाजे से दूर धकेल देता है, गलती से अगर कोई दोबारा आ गया, तो उसके साथ होने वाले व्यवहार की वह कल्पना भी नहीं कर सकता। अगर किसी व्यक्ति ने उनके खिलाफ़ बोलने का दुस्साहस किया, तो स्टाफ़ बद्तमीजी पर उतर आता है और पुलिसिया रौब अलग !
सरकारी अस्पतालों के स्टाफ़ के संवेदनहीन व्यवहार की वजह से लोगों का रूख निजी अस्पतालों की तरफ़ हो रहा है। क्या राज्य सरकार को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं ! क्या अस्पताल में कार्य करने वाले डॉक्टर, नर्स या अन्य स्टाफ नैतिकता, मान-मर्यादा, सामाजिक मूल्य या मानवाधिकार नहीं जानते? क्या एक मरीज को सिर्फ़ दवाओं की ही जरूरत पडती है? क्या प्रेम से बोल लेने पर अस्पताल कर्मियों की नौकरी चली जाएगी? क्या वही स्टाफ़ अपने परिजनों से भी इसी तरह बात करता होगा? क्या मानवाधिकार आयोग को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है?



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गणगौर



आज बाहर कुछ ज्यादा ही शोर सुनाई दे रहा था। समय शायद अभी सुबह के लगभग पाँच ही बजे थे। एक मधुर संगीत की आवाज आ रही थी। उत्सुकतावश कमरे से बाहर निकल कर देखा, तो छोटी-बडी लडकियाँ अपने सिर पर पानी भरे कलश लिये हुए गाते जा रही थी। शायद कोई लोकगीत गाया जा रहा था। मैने बालकनी से नीचे झाँककर उस समूह की एक छोटी बच्ची से पूछा–
ऐ किशोरी ! आज क्या है, जो इतनी तेज आवाज में सुबह-सुबह ही गीत गाती जा रही हो ?
वो पहले जोर से हँसी और फ़िर कानों में मिठास घोलने वाली अपनी प्यारी-सी आवाज में बोली–
क्य़ा भैया ! इतना भी नहीं पता ? आज “गणगौर” है। भूल गये क्या ? उसने अपने चेहरे को शिकायती बनाते हुए कहा।
उसने मुझसे फ़िर कहा–
भैया आप शहर जाकर यहाँ की सब चीजें भूल गये।
उसके 'भैया' कहने में मुझे कितना आत्मविश्वास नजर आया, जिससे वो स्वयं अनजान थी।
मैनें अपने कान पकडे और कहा–
गलती हो गई गुडिया दीदी, माफ़ कर दे, मैं नीन्द में था।
उसने इतना सुना और हँसकर भाग गई एवं लडकियों के समूह में शामिल हो गई।
मुझे अचानक यूँ लगा कि मैं अपने संस्कारों, परम्पराओं को आधुनिकता की आबोहवा में भूल गया जैसे और वो नन्ही किशोरी, अपनी मीठी आवाज से मुझ पर व्यंग कसती हुई चली गई (शहरी कह कर)।

अचानक मुझे एक झटका लगा और मेरी नीन्द टूट गई। मैं पसीने से तर था, आँख खुली तो पता चला कि यह सब तो एक सपना था एवं मैं तो शहर में अपने कमरे में सोया हुआ था।
मगर फ़िर भी ऐसा लग रह था कि यह सपना नहीं, हकीकत ही थी। वैसे भी कहीं न कहीं जब मैं अपने-आप ही शहर व गाँव की तुलना करता, तो अपनी संस्कृति-सभ्यता से दूर होने का अहसास होता था !
मन अब किशोरी को बेचैन होकर तलाशने लगा कि कहीं ये सच तो नहीं था और यही सोचते हुए बाहर आया। बालकनी में आकर खडा हुआ, नजरें चारों तरफ दौड़ाई, लेकिन किशोरी कहीं नजर नहीं आ रही थी।
उसे तलाशते हुए नजर सामने वाले मकान में पड़ी, तो नजर आया कि वहाँ रहने वाली भाभीजी सज-सँवर रही थी। तभी उनकी ननद दौडकर आई और पूछने लगी—
अरे ! भाभी आप तैयार क्यों हो रही हो ? कहीं जाने का ‘प्लान’ है क्या ?
भाभीजी ने जवाब दिया–
नहीं दीदी, कहीं जाने का नहीं बल्कि आज तो घर सजाने की तयारी चल रही है।
"क्यों आज भला क्या है ऐसा ?" उनकी ननद ने विस्मय से पूछा।
भाभीजी बड़े चाव से बोली- आज ‘गणगौर’ है ना, तो हमारे गाँव में लडकियाँ, इसी तरह तैयार होकर 'गणगौर माता' की पूजा करती हैं और यही हमारी संस्कृति है। तो फिर आप भी तैयार हो जाइये जल्दी से, गणगौर पूजने चलेंगे...
इतनी बात सुनते ही उनकी ननद मुँह बनाते हुए बोली–
क्या भाभी ! आप भी ना, शहर आकर भी “देहाती” ही रही। “यू ब्लडी विलेजर्स”
और बालों को झटका देती हुई चली गई।
शायद अंग्रेजी का मतलब तो भाभीजी नहीं समझ पाई, लेकिन ननद की प्रतिक्रिया पर उन्हें आश्चर्य जरूर हुआ होगा, वे फिर से अपने काम में लग गई।
मेरे मन की किशोरी कहीं दूर जाती नजर आई। दूर कहीं से कानों में एक गाने (रैप) की आवाज रही थी—
यो-यो....
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