ओ नीले
अम्बर, बरस-बरस
सूरज
से रही है, आग बरस
तेरे
प्रेम-मिलन की प्यासी यह
जलती
धरती भी रही तरस
मरे जा
रहे हैं, बाँध-नदी
और
धूमिल हो रही हरियाली
घनघोर
घटायें बरसाकर
कर दे
वृक्षों की खुशहाली
देख
तेरी ठंडी फुहार, लगती है जैसे हो अमरस
ये
'मनुज' बहुत ही निर्दयी है
मन में
माया का प्रेम लिए
काट-काट
जंगल इसने
'भू'
के सीने पर घाव किए
यह
नम्र-निमंत्रण है तुझको, आँगन, गलियारे, चौक बरस
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