आज बाहर कुछ ज्यादा ही शोर सुनाई दे रहा था। समय शायद अभी सुबह के लगभग पाँच ही बजे थे। एक मधुर संगीत की आवाज आ रही थी। उत्सुकतावश कमरे से बाहर निकल कर देखा, तो छोटी-बडी लडकियाँ अपने सिर पर पानी भरे कलश लिये हुए गाते जा रही थी। शायद कोई लोकगीत गाया जा रहा था। मैने बालकनी से नीचे झाँककर उस समूह की एक छोटी बच्ची से पूछा–
ऐ किशोरी ! आज क्या है, जो इतनी तेज आवाज में सुबह-सुबह ही गीत गाती जा रही हो ?
वो पहले जोर से हँसी और फ़िर कानों में मिठास घोलने वाली अपनी प्यारी-सी आवाज में बोली–
क्य़ा भैया ! इतना भी नहीं पता ? आज “गणगौर” है। भूल गये क्या ? उसने अपने चेहरे को शिकायती बनाते हुए कहा।
उसने मुझसे फ़िर कहा–
भैया आप शहर जाकर यहाँ की सब चीजें भूल गये।
उसके 'भैया' कहने में मुझे कितना आत्मविश्वास नजर आया, जिससे वो स्वयं अनजान थी।
मैनें अपने कान पकडे और कहा–
गलती हो गई गुडिया दीदी, माफ़ कर दे, मैं नीन्द में था।
उसने इतना सुना और हँसकर भाग गई एवं लडकियों के समूह में शामिल हो गई।
मुझे अचानक यूँ लगा कि मैं अपने संस्कारों, परम्पराओं को आधुनिकता की आबोहवा में भूल गया जैसे और वो नन्ही किशोरी, अपनी मीठी आवाज से मुझ पर व्यंग कसती हुई चली गई (शहरी कह कर)।
ऐ किशोरी ! आज क्या है, जो इतनी तेज आवाज में सुबह-सुबह ही गीत गाती जा रही हो ?
वो पहले जोर से हँसी और फ़िर कानों में मिठास घोलने वाली अपनी प्यारी-सी आवाज में बोली–
क्य़ा भैया ! इतना भी नहीं पता ? आज “गणगौर” है। भूल गये क्या ? उसने अपने चेहरे को शिकायती बनाते हुए कहा।
उसने मुझसे फ़िर कहा–
भैया आप शहर जाकर यहाँ की सब चीजें भूल गये।
उसके 'भैया' कहने में मुझे कितना आत्मविश्वास नजर आया, जिससे वो स्वयं अनजान थी।
मैनें अपने कान पकडे और कहा–
गलती हो गई गुडिया दीदी, माफ़ कर दे, मैं नीन्द में था।
उसने इतना सुना और हँसकर भाग गई एवं लडकियों के समूह में शामिल हो गई।
मुझे अचानक यूँ लगा कि मैं अपने संस्कारों, परम्पराओं को आधुनिकता की आबोहवा में भूल गया जैसे और वो नन्ही किशोरी, अपनी मीठी आवाज से मुझ पर व्यंग कसती हुई चली गई (शहरी कह कर)।
अचानक मुझे एक झटका लगा और मेरी नीन्द टूट गई। मैं पसीने से तर था, आँख खुली तो पता चला कि यह सब तो एक सपना था एवं मैं तो शहर में अपने कमरे में सोया हुआ था।
मगर फ़िर भी ऐसा लग रह था कि यह सपना नहीं, हकीकत ही थी। वैसे भी कहीं न कहीं जब मैं अपने-आप ही शहर व गाँव की तुलना करता, तो अपनी संस्कृति-सभ्यता से दूर होने का अहसास होता था !
मन अब किशोरी को बेचैन होकर तलाशने लगा कि कहीं ये सच तो नहीं था और यही सोचते हुए बाहर आया। बालकनी में आकर खडा हुआ, नजरें चारों तरफ दौड़ाई, लेकिन किशोरी कहीं नजर नहीं आ रही थी।
उसे तलाशते हुए नजर सामने वाले मकान में पड़ी, तो नजर आया कि वहाँ रहने वाली भाभीजी सज-सँवर रही थी। तभी उनकी ननद दौडकर आई और पूछने लगी—
अरे ! भाभी आप तैयार क्यों हो रही हो ? कहीं जाने का ‘प्लान’ है क्या ?
भाभीजी ने जवाब दिया–
नहीं दीदी, कहीं जाने का नहीं बल्कि आज तो घर सजाने की तयारी चल रही है।
"क्यों आज भला क्या है ऐसा ?" उनकी ननद ने विस्मय से पूछा।
भाभीजी बड़े चाव से बोली- आज ‘गणगौर’ है ना, तो हमारे गाँव में लडकियाँ, इसी तरह तैयार होकर 'गणगौर माता' की पूजा करती हैं और यही हमारी संस्कृति है। तो फिर आप भी तैयार हो जाइये जल्दी से, गणगौर पूजने चलेंगे...
इतनी बात सुनते ही उनकी ननद मुँह बनाते हुए बोली–
क्या भाभी ! आप भी ना, शहर आकर भी “देहाती” ही रही। “यू ब्लडी विलेजर्स”
और बालों को झटका देती हुई चली गई।
शायद अंग्रेजी का मतलब तो भाभीजी नहीं समझ पाई, लेकिन ननद की प्रतिक्रिया पर उन्हें आश्चर्य जरूर हुआ होगा, वे फिर से अपने काम में लग गई।
मेरे मन की किशोरी कहीं दूर जाती नजर आई। दूर कहीं से कानों में एक गाने (रैप) की आवाज रही थी—
यो-यो....
— — —
मगर फ़िर भी ऐसा लग रह था कि यह सपना नहीं, हकीकत ही थी। वैसे भी कहीं न कहीं जब मैं अपने-आप ही शहर व गाँव की तुलना करता, तो अपनी संस्कृति-सभ्यता से दूर होने का अहसास होता था !
मन अब किशोरी को बेचैन होकर तलाशने लगा कि कहीं ये सच तो नहीं था और यही सोचते हुए बाहर आया। बालकनी में आकर खडा हुआ, नजरें चारों तरफ दौड़ाई, लेकिन किशोरी कहीं नजर नहीं आ रही थी।
उसे तलाशते हुए नजर सामने वाले मकान में पड़ी, तो नजर आया कि वहाँ रहने वाली भाभीजी सज-सँवर रही थी। तभी उनकी ननद दौडकर आई और पूछने लगी—
अरे ! भाभी आप तैयार क्यों हो रही हो ? कहीं जाने का ‘प्लान’ है क्या ?
भाभीजी ने जवाब दिया–
नहीं दीदी, कहीं जाने का नहीं बल्कि आज तो घर सजाने की तयारी चल रही है।
"क्यों आज भला क्या है ऐसा ?" उनकी ननद ने विस्मय से पूछा।
भाभीजी बड़े चाव से बोली- आज ‘गणगौर’ है ना, तो हमारे गाँव में लडकियाँ, इसी तरह तैयार होकर 'गणगौर माता' की पूजा करती हैं और यही हमारी संस्कृति है। तो फिर आप भी तैयार हो जाइये जल्दी से, गणगौर पूजने चलेंगे...
इतनी बात सुनते ही उनकी ननद मुँह बनाते हुए बोली–
क्या भाभी ! आप भी ना, शहर आकर भी “देहाती” ही रही। “यू ब्लडी विलेजर्स”
और बालों को झटका देती हुई चली गई।
शायद अंग्रेजी का मतलब तो भाभीजी नहीं समझ पाई, लेकिन ननद की प्रतिक्रिया पर उन्हें आश्चर्य जरूर हुआ होगा, वे फिर से अपने काम में लग गई।
मेरे मन की किशोरी कहीं दूर जाती नजर आई। दूर कहीं से कानों में एक गाने (रैप) की आवाज रही थी—
यो-यो....
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