Wednesday, May 15, 2013

सरकारी अस्पतालों में हो रहा मानवाधिकारों का हनन !




यूँ तो ‘अस्पताल’ शब्द सुनते ही सेवाभाव का स्मरण हो जाता है, मगर शहर के अस्पतालों की स्थिति पर नजरडाली जाए, तो वहाँ सेवा तो बहुत दूर की बात है, कोई प्यार से बातचीत तक नहीं करता। सरकारी अस्पतालों में उपस्थित स्टाफ की बोली, भाषा इस तरह की हो चुकी है कि शायद ही कोई वहाँ इलाज कराना चाहेगा !
आज सरकार ने अनेक योजनाएँ चला रखी हैं, जैसे- मुफ़्त जाँच, मुफ़्त दवाइयाँ, आदि। लोग इनसे लाभान्वित भी होते हैं, मगर सरकारी अस्पतालों में कार्य करने वाले स्टाफ़ का व्यवहार बहुत ही रूखा हो चुका है। यहाँ तक की पीज़ी कर रहे डॉक्टर्स भी बद्तमीजी से बात करते नजर आते हैं। उन्हें किसी भी मरीज से कोई सहानुभूति नहीं, चाहे पुरुष हो या महिला। सबसे पहली बात तो ये कि आज अधिकांश सरकारी अस्पताल स्टाफ़ की कमी से जूझ रहे हैं और दूसरी बात ये कि जो डॉक्टर सेवारत हैं, उन्हें अपने क्लीनिकों से फ़ुर्सत नहीं है। इसके बाद रही-सही कसर अस्पताल का नर्सिंग स्टाफ़ पूरी कर देता है। अस्पताल में सुरक्षा के लिए ड्य़ूटी देने वाले गार्ड्स मरीजों के परिजनों से अभद्र भाषा का प्रयोग कर बात करते हैं। क्या ये सब मानवाधिकारों का हनन नहीं है? भारतीय संविधान के अनुसार देश में हर किसी को इज्जत से जीने का अधिकार है, तो फ़िर क्या अस्पताल ‘मानवाधिकार’ या ‘इज्जत’ से बाहर हैं?
शहर के सरकारी अस्पतालों में आने वाले अधिकतर मरीज गाँवों से आते हैं। लोगों को लगता हैं कि बडे अस्पतालों में सभी सुविधाएँ उपस्थित होती हैं, जिससे उनके परिजनों को बेहतर इलाज उपलब्ध हो सकेगा, ऐसी उम्मीद लगाकर लोग इलाज के लिए आते हैं। लेकिन यहाँ तो स्थिति ही इसके एकदम विपरीत है। लम्बी-लम्बी लाइनें, अस्पताल परिसर के बरामदों में पडे हुए मरीज, वार्डों में टूटे, जंग खाये हुए पलंग, फ़टे हुए बिस्तर, पान-गुटखा से रंगी हुई दीवारें, बस ! यही हाल है सरकारी अस्पतालों का। ना तो इस राज्य सरकार का कोई ध्यान है और ना ही किसी स्वयंसेवी संस्था का !
कभी अपने नर्स होने के आदर्शवाद को स्थापित करते हुए मदर टेरेसा ने अपने निजी जीवन का तक त्याग कर दिया था, वहीं आज अस्पतालों में उपस्थित नर्सों का बेरुखा व्यवहार देखकर ऐसा लगता है, जैसे मरीज होना कोई अपराध है। गर्भवती महिलाओं से अस्पताल स्टाफ़ की बद्तमीजी आए दिन देखने को मिलती है। उन्हें इस बात से कोई फ़र्क नहीं पडता कि महिला के साथ आया व्यक्ति, चाहे उनका पिता हो, भाई हो या कोई और ऐसे-ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है कि बाप-बेटी (भाई-बहन या कोई अन्य) एक दूसरे से नजरें तक नहीं मिला पाते। अस्पताल में ड्यूटी करता गार्ड रात को शराब के नशे में पाया जाता है, जो बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं को अस्पताल के दरवाजे से दूर धकेल देता है, गलती से अगर कोई दोबारा आ गया, तो उसके साथ होने वाले व्यवहार की वह कल्पना भी नहीं कर सकता। अगर किसी व्यक्ति ने उनके खिलाफ़ बोलने का दुस्साहस किया, तो स्टाफ़ बद्तमीजी पर उतर आता है और पुलिसिया रौब अलग !
सरकारी अस्पतालों के स्टाफ़ के संवेदनहीन व्यवहार की वजह से लोगों का रूख निजी अस्पतालों की तरफ़ हो रहा है। क्या राज्य सरकार को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं ! क्या अस्पताल में कार्य करने वाले डॉक्टर, नर्स या अन्य स्टाफ नैतिकता, मान-मर्यादा, सामाजिक मूल्य या मानवाधिकार नहीं जानते? क्या एक मरीज को सिर्फ़ दवाओं की ही जरूरत पडती है? क्या प्रेम से बोल लेने पर अस्पताल कर्मियों की नौकरी चली जाएगी? क्या वही स्टाफ़ अपने परिजनों से भी इसी तरह बात करता होगा? क्या मानवाधिकार आयोग को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है?



© Do Not Copy Without Permission
Photo Source: Google

No comments:

Post a Comment