हाईटेक जयपुर… वर्ल्डक्लास जयपुर… महानगर जयपुर…
और भी ना जाने कितने ही नाम दिये जा चुके हैं जयपुर को। कुछ महिनों में तो यहाँ मेट्रो ट्रेन चलाने की कवायद भी जारी है, लेकिन क्या जयपुर में कहीं गुलाबी नगर भी बसा है ? हर जगह अगर नजर आती है तो बस गंदगी, अतिक्रमण और कचरे के ढेर, जिन्हें देखकर एक ही प्रश्न आता है मन में,
"क्या जयपुर इसके लायक भी है ?"
केवल जे.एल.एन.मार्ग को छोड़कर जयपुर की एक भी सड़क ऐसी नहीं है जो अतिक्रमण मुक्त हो, जिसमें परकोटे के अन्दर की तो बात ही निराली है। कहीं पर सड़कें दुकानदारों की साज-सज्जा में न्यौंछावर हैं, तो कहीं ठेलेवालों की खिदमत करती नजर आती हैं। कुछ लोग तो गायों को चारा भी सड़क पर ही डालते हैं, जिससे चारों तरफ गंदगी का आलम नजर आता है और हादसा होने की स्थिति अलग। बस, टैक्सी, रिक्शा-ऑटोरिक्शा सब सडकों को अपना घर समझकर चाहे जहाँ खड़े हो सकते हैं। ऐसी बात नहीं है कि पुलिस या प्रशासन को इस बात की जानकारी नहीं है। कहने को तो सभी अपनी ड्यूटी में मुस्तैद नजर आते हैं, लेकिन क्या फर्क पड़ता है, अगर इतनी बड़ी सड़क पर थोडा-सा अतिक्रमण हो जाए तो।
लो-फ़्लोर बसों के लिए बनाए गए बस स्टॉप्स पर टैम्पो वाले, निजी बसों वाले अवैध कब्जा जमाये बैठे हैं जिसकी वजह से लो-फ़्लोर बसें सवारियों को या तो बस स्टॉप से पहले ही उतार देती हैं या फ़िर उन्हें सडक के बीच में उतरना पडता है। इस गफ़लत में या तो सवारियों को बस मिलती नहीं है या कोई सडक के बीच उतरने पर दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है (एसएमएस अस्पताल के सामने आसानी से देखा जा सकता है) जिसके अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं।
शहर के दूसरे हिस्सों के भी यही हाल हैं। सड़कें गलियाँ बन चुकी हैं। मुख्य सड़कों को जोड़ने वाली सड़कों की स्थिति एकदम बदहाल है। फल-सब्जियों वाले, जूस वाले, चाय वाले चाहे जहाँ कचरा डाल सकते हैं, जो कि शहर की "सुन्दर सड़कों" की खूबसूरती और बढ़ा देती है। ऊँचे-ऊँचे घरों में रहने वाले लोग भी अपने घर को सुन्दर दिखाने की होड़ में घर की केवल अन्दर से सफाई कर देते हैं और कचरा 'सड़क' पर फेंक दिया जाता है जिसका भार वहन करती है,
'बेचारी सडक'। क्योंकि हमारे यहाँ कचरा प्रबंधन
की ना तो जेडीए या नगर निगम को परवाह है और ना ही सरकार को। और हो भी क्यों ? जनता के सेवक हैं, कचरे के थोडे ही हैं। वैसे जनता भी केवल अपने सेवकों को बस दूर से ही देख सकती है, पास गए तो अंजाम भी भुगतना पड सकता है।
शहर को हाल ही में जिस 'सुरंग' से जोडा गया है, वह तो बहुत सुन्दर है, लेकिन थोडे आगे बढें, तो ट्रांसपोर्ट नगर जायें चाहे जवाहर नगर बायपास; दोनों तरफ़ अतिक्रमणों की बाढ आई हुई है। मानसून आ चुका है, फ़िर भी प्रशासन कचरे को बेघर नहीं करवाना चाहता क्योंकि नाले, कचरे का घर बने हुए हैं और पानी बहता है सडक के ऊपर से। कई जगहों पर तो बेचारी सडकों को गड्ढों ने लील लिया है, जहाँ अगर पानी भरा, तो पता नहीं कब, किसका सुहाना सफ़र मातम में बदल जाए।
इतना सब कुछ है फ़िर भी एक उम्मीद हमेशा रहती है कि कभी तो कोई लोकसेवक, कोई सरकार, कोई अधिकारी इनकी सुध लेगा या फ़िर कभी तो सोई हुई जनता जागेगी, सोये हुए प्रशासन को जगाने के लिए, अतिक्रमियों को भगाने के लिए, गंदगी फ़ैलाने वालों को सबक सिखाने के लिए, तब हमारा जयपुर हाईटेक भी बन सकेगा व वर्ल्डक्लास भी और तब यहाँ नजर आएँगी स्वस्थ राहें।
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