यह सोचकर बदल
दिया फ़ैसला
कि उन्हें क्या कहते
जिनका मर चुका
जमीर
जो छोड गए
उस नन्हीं कली को
मरने
या बन गये जो
सौदागर
कि कहीं तो है वो
सुरक्षित
नहीं कुम्हल पाई जो
बस मर गया
वात्सल्य
क्या दे सकेगी
वो माँ किसी को
आँचल फ़िर से
या कह सकेगा
वो बाप अपने-आप को
क्य़ा कह सकेंगे
वो सलाहकार
कि खुदा होते हैं
माँ-बाप
या माँग सकेंगे
बहू अपने 'रत्नों' को
खुदगर्ज बनकर
कर दी जिन्होंने 'हत्या'
उन्हें मौत भी नहीं मिलेगी
रोते फ़िरेंगे मरने को
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