बारिश आ गई…बारिश आ गई…
यह शब्द हर शख्स के मुँह से सुना जा सकता है जब बारिश आती है, चाहे वह ऑफ़िस में कार्य करता कर्मचारी हो या फ़िर कच्चे घर की टूट-फ़ूट को सुधारता बाशिन्दा। सभी के चेहरे पर खुशी छा जाती है। जिसका लुत्फ़ बच्चे, बडे सब उठाते हैं। वैसे तो बारिश खुशी एवं सम्पन्नता का प्रतीक होती है, लेकिन आज सम्पन्न कौन है तथा खुशी किसको है, यह जानना बहुत आवश्यक है।
जो सम्पन्न हैं, बारिश केवल उन्हीं के लिए ही खुशी का प्रतीक है। कॉलेज जाने वाले स्टूडेण्ट्स के लिए बारिश लुभावनी हो सकती है, लेकिन रिक्शा चलाने वालों के लिए नहीं; अपार्टमैण्ट्स में रहने वाले लोगों के लिए आकर्षक हो सकती है, लेकिन फ़ुटपाथ पर सोने वालों के लिए नहीं।
क्यों ? क्या इन लोगों के लिए कोई दूसरा भगवान होता होगा आसमान में ? क्या इनके लिए दूसरी सरकार बनाई जानी चाहिए ? क्या ये लोग भारतीय/ इंसान नहीं ? हर वर्ष एक बजट पारित होता है, हजारों योजनाएँ बनती हैं, अनेकों घोषणाएँ होती हैं कि गरीबों को घर, मुफ़्त भोजन, रैन-बसेरे वगैरह-वगैरह, लेकिन वह सब क्यों नहीं मिल पाता इन लोगों को ? हर बार क्यों होते हैं घपले ? और घपले होने पर जाँच के
नाम पर क्यों बना दी जाती है, समिति ? क्या उस घोषणा/योजना के बचे-खुचे को डकारने के लिए ?
शहर के सभी रास्तों को इंतजार है बारिश आने का, जिससे लोगों में भ्रम पैदा हो जाये कि यहाँ सडक है और वे अपनी जीवन-यात्रा पूरी कर लें। अनेकों स्कीम्स बनती हैं सडकों, नालों आदि के लिए, सडक किनारे वृक्षारोपण के लिए, लेकिन
ना तो कहीं पर सडकें ही हैं और ना ही कहीं पर नाले। उल्टा सडकें ही नाले बनी हुई नजर आती हैं। रही बात वृक्षारोपण की तो नये पौधे तो बहुत दूर की बात हैं, इसके उलट जो पेड पहले से लगे हुए हैं, 'सौन्दर्यीकरण' के नाम पर उनको और काट दिया जाता है। शहर में 'कॉलोनाइजर्स इफ़ैक्ट्स' के चलते कहीं भी कॉलोनी बनाई जा सकती है, सरकारी/नदी-नालों की जमीन पर भी।
पहले तो जो लोग अवैध कब्जे करते थे उनके खिलाफ़ पुलिस या प्रशासन कार्यवाही भी करता था लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है, अब या तो कब्जा कोई प्रशासनिक व्यक्ति ही करता है या फ़िर 'पहुँच' वाले भी बहुत लोग हैं जिनके खिलाफ़ आवाज उठाना बेहद गम्भीर हो सकता है !
हर वर्ष इतनी बारिश होती है कि यदि उसका सही प्रबन्धन हो तो आने वाले एक-दो वर्षों तक पानी की कमी नहीं रहे। लेकिन बहाव क्षेत्रों में बढ रहे अतिक्रमणों के कारण नदी-बाँध सूखे के सूखे रह जाते हैं एवं आने वाले वर्ष तो बहुत दूर की बात है, वर्तमान वर्ष में ही पानी की कमी की मार झेलनी पडती है तथा जल की कमी के कारण अक्सर लोगों की लडाई देखने या सुनने में आती है।
पानी की बचत करने के लिए लोगों को अपने व्यक्तिगत स्तर पर भी प्रबंध कर वर्षा जल संरक्षण करना चाहिए। अक्सर लोग बहुमूल्य पानी की बर्बादी अपने वाहनों को धोने में करते हैं, उन्हें भी पानी की कीमत को समझना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य होना चाहिए कि वह अपने जीवन में दस वृक्ष कम से कम लगाए।
मानव जीवन में वृक्षों का अहम योगदान है एवं लोग आजकल वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई कर प्रकृति के नियमों की अवहेलना कर रहे हैं जिसका खामियाजा पहले भी भुगतते रहे हैं और आगे भी भुगतते रहेंगे। अब वर्षा होती तो है लोगों को सुकून का अहसास भी कराती है लेकिन एक नजरिये से देखा जाये तो लगता है जैसे आसमाँ रो रहा हो धरती की दुर्दशा पर।
वो कहते हैं, निखर उठी है धरती फ़ुहारों से
हमने कहा- देखकर कुरूप वसुधा, रोता है आसमाँ
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