दीवाना हूँ मैं उस "नादान इश्क"
का
जो हुआ था कभी, "अल्हड़पन" में
बेफिक्र हो जिन्दगी से जीना
कितना मजा है पागलपन में
जाने कब गिर गया मैं इस दरिया में,
डूबता गया और डूबता गया, प्रेम माधुरी की
गहराई में
प्यार मिला, दर्द मिला, ख़ुशी मिली, तड़प
मिली
कितना मजा है, चाहे लाख होंगे,
"रंज-ओ-गम" इश्क में
नजरें झुक जाती कजरारी, टकराकर मेरी नजरों
से
छिप जाता चेहरा मेरा, घनी जुल्फों की छाँव
में
आज भी सिहर उठती है, "रूह"
कुछ अंदाज ही ऐसा था, लबों का, थरथराने में
कितना रास आया बाँहों का गुलिस्ताँ
तकिया भी बन गया है साथी, नींद में,
लिपटने में
वो स्पर्श मेरे गालों पर, कोमल हाथों का
और दौड़कर सिमट जाना, मेरे सीने में
"प्यार" तो आज भी नादान-सा है
पर अब सब समाँ गया, "भूत" में
हर चीज से जुडा जो है "वो"
कि
जीना अच्छा लगता है, "अल्हड़पन" में
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