Wednesday, May 15, 2013

माँ



इक प्यारी-सी सूरत, इक सादी-सी मूरत
ना कोई उनके दिल में हसरत, ना कोई उनकी चाहत
ना जानें कहाँ से पाया, ऐसा विशाल ह्रदय !
इतना सबकुछ सहने की ताकत

मेरी एक मुस्कान देखकर, मन ही मन अपने-आप से कहती हुई–
तेरी हँसी, हँसता तेरा अंश
उसकी रगों में, बहता हुआ हुआ तेरा खून
उसके दिल में, धडकती हुई तेरी धडकनें
उसकी साँसों से महकता, तेरा संसार
सबकुछ तो पा लिया, अब बचा नहीं कुछ भी
बस ! इतने में ही मुस्कुराती है वो

दिनभर अपने को व्यस्त रखती है वो
कभी अपने को दूसरों से नहीं परखती
कभी कुछ ना होने पर नहीं तडपती है वो
मुझ पर असीम-स्नेह, ममता लुटाती
कभी मेरी गलतियों पर नहीं गरजती हैं वो
कहती है मुझे, बस ! मेरा ध्यान रखने की
एक बार भी अपना ध्यान नहीं रखती हैं वो

उदास नहीं होती हैं, कभी मेरे सामने
एक हल्की-सी मुस्कान बनाती हैं
ना जानें कितने ही नाम दिए हैं मुझे
कितनी ही बार मुझे दुलारती हैं वो
बिठा लेती हैं, कभी अपनी गोद में
और एक ही बात, दोहराती हैं सदा
बेटा, ध्यान रखना अपना

उनकी गोद में, अब सो जाने को दिल करता है
उन्हें एक बार नहीं, हर बार माँ कहने को दिल करता है
जी चाहता है, लिपटा रहूँ, उनके आँचल से
वो बचपन कभी ना जाए, मेरे जीवन से
जो गुजरा उनकी छाँव में, एक बार फिर रहूँ उनके पास

वो छाछ बनाती हुई मेरी माँ
मुझे देती है, मक्खन लाकर
मैं कुछ खाऊँ, कुछ लगा दूँ, उनके और अपने चेहरे पर
और वो खिलखिलाती रहें, मेरी जीवंतता से
मुख देख-देख मेरा, मुस्कुराती हैं वो

गर जो, एक दुनियाँ होती कुछ इस तरह
की रहते मेरी माँ और मैं, दोनों हम
उनकी गोद में सिमट जाता, उनके आँचल में छिप जाता
और वक्त थम जाता उस पल काश !
कभी दूर नहीं हो पाते हम
फिर कभी ना बिछुद्ती, मेरी साँसों से वो

कि खुदा ने इस तरह बनाया होता जीवन
मुझे मिलता मौक़ा दुबारा, तो कहता खुदा से मैं–
जी लेने दे मुझे, एक और बचपन, मेरी माँ की गोद में
और कभी ख़त्म ना होता वो पल
कि मैं जानता, ये क्षणिक मात्र बचपन है मेरा
तो जिया होता हर एक लम्हा माँ के साथ
कोशिश करता सदा उन्हें खुश रखने की
फिर क्यारी की तरह, लहलहाती वो

एक तड़प रहेगी जीवनभर, जो लिपटा रहता मैं,
माँ के आँचल में, कभी ना छोड़ता उनका दामन
सिमट जाता उनके लावण में
और ना जानें कितनी ही बार दोहराता
माँ, ओss माँ
और माँ, मुझे देखकर सदा मुस्कुराती, हँसती
मुझे पकड़ने भागती, पकड़कर दुलारती और कहती–
बेटा, ध्यान रखना अपना

अब बड़ा हो गया हूँ मैं, लेकिन माँ तो माँ हैं
और मैं उनका बच्चा हूँ
बहुत दूर आ गया हूँ, अब उनसे
पर यादें जेहन में ताजा रखता हूँ
जब भी मिलता हूँ माँ से, तो ना जाने कितने ही नामों से
पुकारती हैं, दुलारती हैं, गोद में सुलाती हैं और
हर बार एक ही बात दोहराती हैं, बचपन से आज तक–
बेटा, ध्यान रखना अपना
माँ क्यों अपना ध्यान नहीं रखती हैं ? माँ क्यों हैं ऐसी ?

कि दुख में भी सदा मुस्कुराती हैं वो



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