Saturday, July 27, 2013

रोता आसमाँ... धरती की दुर्दशा पर…




बारिश आ गई…बारिश आ गई…
    यह शब्द हर शख्स के मुँह से सुना जा सकता है जब बारिश आती है, चाहे वह ऑफ़िस में कार्य करता कर्मचारी हो या फ़िर कच्चे घर की टूट-फ़ूट को सुधारता बाशिन्दा। सभी के चेहरे पर खुशी छा जाती है। जिसका लुत्फ़ बच्चे, बडे सब उठाते हैं। वैसे तो बारिश खुशी एवं सम्पन्नता का प्रतीक होती है, लेकिन आज सम्पन्न कौन है तथा खुशी किसको है, यह जानना बहुत आवश्यक है।
       जो सम्पन्न हैं, बारिश केवल उन्हीं के लिए ही खुशी का प्रतीक है। कॉलेज जाने वाले स्टूडेण्ट्स के लिए बारिश लुभावनी हो सकती है, लेकिन रिक्शा चलाने वालों के लिए नहीं; अपार्टमैण्ट्स में रहने वाले लोगों के लिए आकर्षक हो सकती है, लेकिन फ़ुटपाथ पर सोने वालों के लिए नहीं।
       क्यों ? क्या इन लोगों के लिए कोई दूसरा भगवान होता होगा आसमान में ? क्या इनके लिए दूसरी सरकार बनाई जानी चाहिए ? क्या ये लोग भारतीय/ इंसान नहीं ? हर वर्ष एक बजट पारित होता है, हजारों योजनाएँ बनती हैं, अनेकों घोषणाएँ होती हैं कि गरीबों को घर, मुफ़्त भोजन, रैन-बसेरे वगैरह-वगैरह, लेकिन वह सब क्यों नहीं मिल पाता इन लोगों को ? हर बार क्यों होते हैं घपले ? और घपले होने पर जाँच के नाम पर क्यों बना दी जाती है, समिति ? क्या उस घोषणा/योजना के बचे-खुचे को डकारने के लिए ?
     शहर के सभी रास्तों को इंतजार है बारिश आने का, जिससे लोगों में भ्रम पैदा हो जाये कि यहाँ सडक है और वे अपनी जीवन-यात्रा पूरी कर लें। अनेकों स्कीम्स बनती हैं सडकों, नालों आदि के लिए, सडक किनारे वृक्षारोपण के लिए, लेकिन ना तो कहीं पर सडकें ही हैं और ना ही कहीं पर नाले। उल्टा सडकें ही नाले बनी हुई नजर आती हैं। रही बात वृक्षारोपण की तो नये पौधे तो बहुत दूर की बात हैं, इसके उलट जो पेड पहले से लगे हुए हैं, 'सौन्दर्यीकरण' के नाम पर उनको और काट दिया जाता है। शहर में 'कॉलोनाइजर्स इफ़ैक्ट्स' के चलते कहीं भी कॉलोनी बनाई जा सकती है, सरकारी/नदी-नालों की जमीन पर भी।
      पहले तो जो लोग अवैध कब्जे करते थे उनके खिलाफ़ पुलिस या प्रशासन कार्यवाही भी करता था लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है, अब या तो कब्जा कोई प्रशासनिक व्यक्ति ही करता है या फ़िर 'पहुँच' वाले भी बहुत लोग हैं जिनके खिलाफ़ आवाज उठाना बेहद गम्भीर हो सकता है ! 
    हर वर्ष इतनी बारिश होती है कि यदि उसका सही प्रबन्धन हो तो आने वाले एक-दो वर्षों तक पानी की कमी नहीं रहे। लेकिन बहाव क्षेत्रों में बढ रहे अतिक्रमणों के कारण नदी-बाँध सूखे के सूखे रह जाते हैं एवं आने वाले वर्ष तो बहुत दूर की बात है, वर्तमान वर्ष में ही पानी की कमी की मार झेलनी पडती है तथा जल की कमी के कारण अक्सर लोगों की लडाई देखने या सुनने में आती है।
      पानी की बचत करने के लिए लोगों को अपने व्यक्तिगत स्तर पर भी प्रबंध कर वर्षा जल संरक्षण करना चाहिए। अक्सर लोग बहुमूल्य पानी की बर्बादी अपने वाहनों को धोने में करते हैं, उन्हें भी पानी की कीमत को समझना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य होना चाहिए कि वह अपने जीवन में दस वृक्ष कम से कम लगाए।
     मानव जीवन में वृक्षों का अहम योगदान है एवं लोग आजकल वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई कर प्रकृति के नियमों  की अवहेलना कर रहे हैं जिसका खामियाजा पहले भी भुगतते रहे हैं और आगे भी भुगतते रहेंगे। अब वर्षा होती तो है लोगों को सुकून का अहसास भी कराती है लेकिन एक नजरिये से देखा जाये तो लगता है जैसे आसमाँ रो रहा हो धरती की दुर्दशा पर।
वो कहते हैं, निखर उठी है धरती फ़ुहारों से
हमने कहा- देखकर कुरूप वसुधा, रोता है आसमाँ



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Tuesday, July 16, 2013

फ़ैसला



यह सोचकर बदल
दिया फ़ैसला
कि उन्हें क्या कहते
जिनका मर चुका
जमीर
जो छोड गए
उस नन्हीं कली को
मरने
या बन गये जो
सौदागर

कि कहीं तो है वो
सुरक्षित
नहीं कुम्हल पाई जो
बस मर गया
वात्सल्य
क्या दे सकेगी
वो माँ किसी को
आँचल फ़िर से
या कह सकेगा
वो बाप अपने-आप को

क्य़ा कह सकेंगे
वो सलाहकार
कि खुदा होते हैं
माँ-बाप
या माँग सकेंगे
बहू अपने 'रत्नों' को
खुदगर्ज बनकर
कर दी जिन्होंने 'हत्या'
उन्हें मौत भी नहीं मिलेगी
रोते फ़िरेंगे मरने को


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Saturday, July 6, 2013

तलाश - एक स्वच्छ राह की…





हाईटेक जयपुर… वर्ल्डक्लास जयपुर… महानगर जयपुर…
              और भी ना जाने कितने ही नाम दिये जा चुके हैं जयपुर को। कुछ महिनों में तो यहाँ मेट्रो ट्रेन चलाने की कवायद भी जारी है, लेकिन क्या जयपुर में कहीं गुलाबी नगर भी बसा है ? हर जगह अगर नजर आती है तो बस गंदगी, अतिक्रमण और कचरे के ढेर, जिन्हें देखकर एक ही प्रश्न आता है मन में, "क्या जयपुर इसके लायक भी है ?"
               केवल जे.एल.एन.मार्ग को छोड़कर जयपुर की एक भी सड़क ऐसी नहीं है जो अतिक्रमण मुक्त हो, जिसमें परकोटे के अन्दर की तो बात ही निराली है। कहीं पर सड़कें दुकानदारों की साज-सज्जा में न्यौंछावर हैं, तो कहीं ठेलेवालों की खिदमत करती नजर आती हैं। कुछ लोग तो गायों को चारा भी सड़क पर ही डालते हैं, जिससे चारों तरफ गंदगी का आलम नजर आता है और हादसा होने की स्थिति अलग। बस, टैक्सी, रिक्शा-ऑटोरिक्शा सब सडकों को अपना घर समझकर चाहे जहाँ खड़े हो सकते हैं। ऐसी बात नहीं है कि पुलिस या प्रशासन को इस बात की जानकारी नहीं है। कहने को तो सभी अपनी ड्यूटी में मुस्तैद नजर आते हैं, लेकिन क्या फर्क पड़ता है, अगर इतनी बड़ी सड़क पर थोडा-सा अतिक्रमण हो जाए तो।
               लो-फ़्लोर बसों के लिए बनाए गए बस स्टॉप्स पर टैम्पो वाले, निजी बसों वाले अवैध कब्जा जमाये बैठे हैं जिसकी वजह से लो-फ़्लोर बसें सवारियों को या तो बस स्टॉप से पहले ही उतार देती हैं या फ़िर उन्हें सडक के बीच में उतरना पडता है। इस गफ़लत में या तो सवारियों को बस मिलती नहीं है या कोई सडक के बीच उतरने पर दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है (एसएमएस अस्पताल के सामने आसानी से देखा जा सकता है) जिसके अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं।
                शहर के दूसरे हिस्सों के भी यही हाल हैं। सड़कें गलियाँ बन चुकी हैं। मुख्य सड़कों को जोड़ने वाली सड़कों की स्थिति एकदम बदहाल है। फल-सब्जियों वाले, जूस वाले, चाय वाले चाहे जहाँ कचरा डाल सकते हैं, जो कि शहर की "सुन्दर सड़कों" की खूबसूरती और बढ़ा देती है। ऊँचे-ऊँचे घरों में रहने वाले लोग भी अपने घर को सुन्दर दिखाने की होड़ में घर की केवल अन्दर से सफाई कर देते हैं और कचरा 'सड़क' पर फेंक दिया जाता है जिसका भार वहन करती है, 'बेचारी सडक'। क्योंकि हमारे यहाँ कचरा प्रबंधन 
की ना तो जेडीए या नगर निगम को परवाह है और ना ही सरकार को। और हो भी क्यों ? जनता के सेवक हैं, कचरे के थोडे ही हैं। वैसे जनता भी केवल अपने सेवकों को बस दूर से ही देख सकती है, पास गए तो अंजाम भी भुगतना पड सकता है।
                शहर को हाल ही में जिस 'सुरंग' से जोडा गया है, वह तो बहुत सुन्दर है, लेकिन थोडे आगे बढें, तो ट्रांसपोर्ट नगर जायें चाहे जवाहर नगर बायपास; दोनों तरफ़ अतिक्रमणों की बाढ आई हुई है। मानसून आ चुका है, फ़िर भी प्रशासन कचरे को बेघर नहीं करवाना चाहता क्योंकि नाले, कचरे का घर बने हुए हैं और पानी बहता है सडक के ऊपर से। कई जगहों पर तो बेचारी सडकों को गड्ढों ने लील लिया है, जहाँ अगर पानी भरा, तो पता नहीं कब, किसका सुहाना सफ़र मातम में बदल जाए।
                 इतना सब कुछ है फ़िर भी एक उम्मीद हमेशा रहती है कि कभी तो कोई लोकसेवक, कोई सरकार, कोई अधिकारी इनकी सुध लेगा या फ़िर कभी तो सोई हुई जनता जागेगी, सोये हुए प्रशासन को जगाने के लिए, अतिक्रमियों को भगाने के लिए, गंदगी फ़ैलाने वालों को सबक सिखाने के लिए, तब हमारा जयपुर हाईटेक भी बन सकेगा व वर्ल्डक्लास भी और तब यहाँ नजर आएँगी स्वस्थ राहें।



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Wednesday, July 3, 2013

केदारनाथ



बर्बादी का मंजर है, उन जवाँ वादियों में
जहाँ बरस पडा आसमाँ क़हर बनकर

वैसे जाते तो हैं लोग देखने खुदा
तोड़कर नियम खुश होते हैं मगर

वो है कहाँ समाज, कहता है 'सभ्य' स्वयं को
अब कुछ तो दे-दो सांत्वना उन्हें, जो लौटे हैं मरकर 

बैठकर महलों में, करते हो 'राजनीति'
कुछ ढाढ़स तो बँधाओ, उन 'लाशों' को जाकर

वो रहता है 'श्मशान' में, 'नाथ-ए-केदार'
मत बाँधने की कोशिश करो, मर जाओगे जलकर



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Friday, June 28, 2013

साँझ ढले



साँझ ढले, बाग में बैठे, जब-जब देखता हूँ
इन प्रेमी युगलों को, तो कभी खुशी,
कभी जलन होती है, कभी मैं तुझमें होता हूँ
कभी तू मेरी, यादों में होती है

कहीं हँसता हुआ, "प्रेम" देखकर
तेरी खिलखिलाहट, कानों में गूँजती है
कहीं हाथों में हाथ, नजर आते ही
तू सीने में, महसूस होती है

कितनी रौनक, यहाँ बाग में, फ़िर भी मैं तन्हा क्यों
तू नहीं है साथ मेरे, फ़िर भी है, मुझमें क्यों
ये वृक्ष भी शांत हैं, तन्हा, मेरी तरह
फ़िर भी इस, तन्हाई का दर्द, मुझे ही क्यों

मेरे शांत, निश्चल, जीवन में, क्यों तू हर जगह होती है
तेरा अक्स नजर, आता है मुझे, मेरी आँखें रोती हैं
जब तू ही जा चुकी, दूर मुझसे,
फ़िर क्यों तेरी, याद बाकी है

मैं करता हूँ प्रेम, कि प्रेम में हूँ
तू मुझमें है, कि मैं तुझमें हूँ
यूँ तो तेरी नजरें, दूर तक, कहीं नजर आती नहीं
फ़िर भी क्यों, मेरे खालीपन में, तू मुझमें होती है



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